
कमरे में सन्नाटा था, सिर्फ मिराल की सिसकियों की आवाज गूंज रही थी। उसका शरीर टूट चुका था, खून से लथपथ चादर पर वो सिमटी हुई थी, जैसे कोई घायल जानवर। उसकी आँखें सूजी हुई थीं, और चेहरा आँसुओं और खून से भीगा था। वो अपनी दीदी को याद कर रही थी, लेकिन अब कोई उम्मीद नहीं बची थी। तभी बाहर से भारी कदमों की आवाज आई। मिराल का दिल डर से धड़कने लगा। वो जानती थी कि समर्थ वापस आ रहा है।
दरवाजा जोर से खुला, और समर्थ अंदर दाखिल हुआ। उसकी आँखों में वही ठंडी क्रूरता थी, जो मिराल को हर बार डरा देती थी। उसका चेहरा पत्थर की तरह सख्त था, और उसकी साँसें गुस्से से भारी थीं। वो मिराल के पास आया और उसे घूरने लगा, जैसे वो कोई शिकार हो। मिराल ने अपने घुटनों को और जोर से सीने से चिपकाया, जैसे वो खुद को बचा लेगी। लेकिन समर्थ के सामने उसकी कोई ताकत नहीं थी।







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