
मिराल का नंगा, जख्मी शरीर उस ठंडे बेड पर पड़ा था। उसकी हालत ऐसी थी कि कोई भी उसे देखकर रो पड़ता। इतनी मासूम, नाजुक सी लड़की के साथ कोई इतनी बेरहमी कैसे कर सकता था? वो बेहोश थी, लेकिन बेहोशी में भी उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। उसका शरीर दर्द से कराह रहा था, और हर साँस के साथ उसकी छाती काँप रही थी। उसके होंठ सूख चुके थे, और चेहरा पीला पड़ गया था, जैसे उसमें जान ही नहीं बची हो।
थोड़ी देर बाद कमरे का दरवाजा फिर से खुला। समर्थ अंदर आया। उसकी आँखों में वही क्रूरता थी, लेकिन जब उसने मिराल की हालत देखी, तो उसका गुस्सा, जो थोड़ा सा शांत हुआ था, फिर से भड़क उठा। वो कोई इंसान नहीं, एक राक्षस था। उसके अंदर दया नाम की चीज नहीं थी। अब तक जो भी उसके रास्ते में आया, उसने उसे बिना वक्त गंवाए मौत के घाट उतार दिया था। लेकिन मिराल के साथ उसकी क्रूरता कुछ और ही थी। वो उसे सिर्फ मारना नहीं चाहता था; वो उसे हर पल तड़पाना चाहता था।







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