
वान्या की साँसें रुक सी गईं थीं। कमरे की हवा भारी हो चुकी थी, जैसे मौत खुद वहाँ खड़ी हो। वंश की वो गंदी, जहरीली हँसी अभी भी उसके कानों में गूँज रही थी। वो धीरे-धीरे उसके करीब आ रहा था, आँखों में वो पागलपन, वो भूख... जो देखकर वान्या का दिल धड़क-धड़क कर फटने वाला था।
"वैसे भी मुझे पता है तू कहाँ गई थी, साली..." वंश ने दाँत पीसते हुए कहा, उसकी आवाज़ में ज़हर घुला हुआ था। "खुद रंडी है... दो-दो लड़कों से अपनी गांड मरवा रही है... और यहाँ भाई को सुखा रखती है? आज तुझे दिखाता हूँ मैं कितना खतरनाक मर्द हूँ... तेरी चीखें सुनकर मज़ा आएगा!"






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