
लेकिन आदमी ने अपना सिर नीचे झुका हुआ था और उसकी चीखें सुन रहा था। वो ऐसा इंसान नहीं था जिसे किसी के जीने या मरने से कोई फर्क पड़ता हो, चाहे वो उसका अपना ही क्यों न हो। बहुत छोटी उम्र में उसने बहुत कुछ खो दिया था और उस दर्द ने उसके आगे की सारी जिंदगी के दर्द को मिटा दिया था। अब उसकी उम्र जितनी थी, उसमें किसी के लिए कोई दया या भावना होना नामुमकिन था।
उसकी आँखों में कोई भावना नहीं थी। जैसे उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा हो।







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